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धान की संरक्षण तकनीक
भारत एक कृषि प्रधान देश है, भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से विभिन्न फसलों
के उत्पादन एवं उत्पादकता पर आधारित है | धान का भारतीय कृषि मे प्रमुख स्थान है,
और इसका खाद्य सुरक्षा मे मुख्य योगदान है तथा भारत मे धान की खेती विभिन्न
पर्यावरणों एवं फसलचक्रो मे की जाती है | सामान्यत: धान की उपज मे क्षति के लिए ३३
प्रतिशत खरपतवार, २६ प्रतिशत रोग, २० प्रतिशत कीट, ८ प्रतिशत चूहे एवं १३ प्रतिशत
अन्य पीडक उत्तरदायी है, इनके द्वारा कभी-कभी गम्भीर स्थिति मे पूरी फसल भी खराब हो
जाती है और पैदावार न के बराबर होती है | उन्नत बौनी किस्मों को उच्च निवेश-स्तर के
साथ उगाने से जहाँ अधिक उत्पादन प्राप्त हुआ, वहीं कीट-व्याधियों को भी अनुकूल
वातावरण मिला, इस कारण वर्तमान में धान-उत्पादकों को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा
है । इन व्याधियों के कारण जितनी अधिक उपज में गिरावट होती है, उतना ही इनके
नियंत्रण की ओर ध्यान देना आवश्यक हो गया है । अत: इन पीडको के प्रबन्धन के लिए समय
से उचित संरक्षण तकनीक किसानो तक पहुँचाना अति आवश्यक है, जिससे कि फसल को नुकसान
से बचाया जा सके | विशिष्टि पीडक की पंहचान, क्षति की प्रकृति, क्षति के लक्षण तथा
जीवन-चक्र की उपयुक्त जानकारी प्रभावी सरंक्षण तकनीक के लिए अति आवश्यक है |
संरक्षण तकनीक के अर्न्तगत हम धान की फसल को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित पीड़को
के बारे में विस्तृत रूप से जानेगें:
रोग एवं उनका नियंत्रण
कीट एवं उनका नियंत्रण
खरपतवार एवं उनका नियंत्रण
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