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धान के रोग एवं उनसे बचाव

 प्रकृति पृथ्वी पर सैदव ही जैव-संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है, परन्तु मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इस संतुलन को प्रायः नष्ट करने पर उद्यत दिखाई देता है । पिछले तीन दशकों में बढ़ती जनसंख्या की उदर-पूर्ति के लिए खाद्यान्न उत्पादन के नये आयाम बनाए गये । धान फसल का इसमें सार्थक आयाम बनाए गये । धान फसल का इसमें सार्थक योगदान रहा । उन्नत बौनी किस्मों को उच्च निवेश-स्तर के साथ उगाने से जहाँ अधिक उत्पादन प्राप्त हुआ, वहीं कीट-व्याधियों को भी अनुकूल वातावरण मिला, इस कारण वर्तमान में धान-उत्पादकों को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है । इन व्याधियों के कारण जितनी अधिक उपज में गिरावट होती है, उतना ही इनके नियंत्रण की ओर ध्यान देना आवश्यक हो गया है ।

नाइट्रोजन की अधिक मात्रा उपयोग करने से धान पर जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी, तनागलन, बदरा एवं आभारी कांगियारी आदि रोगों का प्रकोप बढ़ता है । उत्तरी-पश्चिमी भारत में पाया गया कि १५ जुलाई से पहले की रोपाई में बदरा एवं बंट का प्रकोप कम होता है, जबकि देर से रोपाई करने पर आभासी कांगियारी का संक्रमण घटता है । यही नहीं किस्मों में भी रोग-रोधिता स्तर में भिन्नता है । हरियाणा कृषि विश्विद्यालय के कौल केन्द्र पर विभिन्न बासमती किस्मों में बदरा का प्रकोप ९.७ से ५१.४ प्रतिशत अनुमानित किया गया । चंद आदि (१९८५) ने धान की किस्मों में बहु-रोग-रोधिता के महत्व की ओर ध्यान आकर्षित कराया, क्योंकि रोग-रोधी किस्मों की उपलब्धता से रासायनिक नियंत्रण की आवश्यकता न होगी और साथ ही वातावरण दूषित होने से बचेगा । जैव- नियंत्रण हेतु सुडोमोनास (Pseudomonas spp.) की ४ प्रथक (Isolates) हैदराबाद, मारूटेरू तथा चिपलिमा पर परखे गये, परन्तु पर्णच्छद अंगमारी के नियंत्रण में इनसे सफलता प्राप्त नहीं हुई (डी.आर.आर., १९९५बी )।

पिछले २-३ दशकों में पौध-संरक्षण पर विशेष दिया गया । ऐसा अनुभव किया गया, कि केवल कवकनाशियों का प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है, परन्तु वातावरण -प्रदूषण से बचने हेतु ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना, जिससे पौधों पर इन कवक, जीवाणु एवं वाइरस का संक्रमण न हो अथवा कम हो । दूसरे शब्दो में कहा जा सकता है कि ये भी वातावरण में रहें, परन्तु धान की फसल को इतनी हानि न बहुचाएँ कि उपज में कहा जा सकता है कि ये भी वातावरण में रहें, परन्तु धान की फसल को इतनी हानि न पहुचाएँ कि उपज में अधिक गिरावट हो तथा अर्थिक लाभ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।

रोगों का विस्तार तापमान एवं अन्य जलवायु संम्बधी संम्बधी कारको पर निर्भर करता है, साथ ही सस्य-क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है । धान के मुख्य रोगों को उनके अभिकर्ता के आधार पर तीन भागों में बाटा जाता है ।

कवकीय (Fungal) जीवाणुज़ (Bacterial) वाइरस (Virus)
बदरा (Blast)
तनागलन (Stem rot)
तलगलन एवं बकाने (Foot rot & bakanae)
पर्णच्छद गलन (Sheath rot)
पर्णच्छद अंगमारी (Sheath blight)
भूरी-चित्ती (Brown spot)
आभासी कांगियारी (False smut)
उदबत्ता (Udbatta)

जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी (Bacterial leaf blight)
जीवाणुज़ पत्ती रेखा (Bacterial leaf streak)

टुंग्रो (Tungro)
घासीय-वृद्धि रोग (Grassy stunt)

रोगों के लक्षण पौधों की पत्तियों, पर्णच्छद, पुष्पगुच्छ तथा दानों पर पाए जाते हैं । कुछ को पत्तियों पर पाई जाने वाली विक्षति (Lesion) से पहचाना जा सकता है । चित्र-७१ में इस प्रकार की विक्षति दर्शायी गयी है (आऊ, १९७३) । प्रायः जीवाणु ग्रसित छोटे पौधे झुलसकर मरते है अथवा पत्तियों के किनारों पर विक्षति होती है, जबकि वाइरस ग्रसित पौधे की अवरूद्ध बढ़वार तथा दौजियों की अधिकता एवं पत्तियों के रंग में बदलाव होता है । चक्रवर्ती (१९७८) ने धान के रोगों को पौधो के विभन्न भागों पर संक्रमणता के आधार पर वर्गीकृत किया, जिससे फसल की उन विशेष अवस्थाओं पर ध्यान रखने से रोग प्रबंध अधिक प्रभावशाली हो सकेगा ।
वर्गीकरण निम्न प्रकार हैः

पौद की अवस्था (Seedling stage)
बदरा, भूरे धब्बे तलगलन एवं बकाने और जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी ।

पर्णच्छद एवं तने पर
बदरा, तनागलन, पर्णच्छद अंगमारी, तलगलन और पर्णच्छद गलन ।

पत्तियाँ (Foliage)
बदरा, भूरा धब्बे (भूरी चित्ती), संर्कीण पत्ती चित्ती, जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी, जीवाणुज़ पत्ती रेखा और टुग्रों ।
दाने पर
बदरा, भूरे धब्बे, बंट (Bunt), आभासी कांगियारी और उदबत्ता ।
  धान के सघन क्षेत्रों में कुछ प्रतिवर्ष संक्रमण करते हैं तथा कभी-कभी ये उग्र रूप धारण कर लेते हैं, जिससे उपज में महत्वपूर्ण गिरावट होती है । अतः इन क्षेत्रों में रोग विशेष पर अधिक सर्तकता की आवश्यकता है, ऐसे क्षेत्रीय भाग निम्न हैः

बदराः कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं प. बंगाल का पहाड़ी क्षेत्र, असम और मेघालय, बिहार के रांची, पलामू एवं छोटा नागपुर कोरापुर (उड़ीसा), आन्ध्र प्रदेश की आराकू घाटी, कोर्ग (कर्नाटक), रत्नागिरी (महाराष्ट्र), मध्य प्रदेश के बस्तर और सरगुजा के भाग एवं व्यानन्द और कुट्टांनद (केरल) ।

भूरी चित्तीः उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, मध्य प्रदेश, प.बंगाल, असम, एवं तमिलनाडु के कुछ भाग, कर्नाटक एवं केरल के तटीय क्षेत्र ।

तनागलनः पंजाब, हरियाणा एवं तमिलनाडु ।

उदबत्ताः उड़ीसा का पहाड़ी क्षेत्र कोरापुर, महाराष्ट्र का कोंकण और आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक ।

रोग नियत्रंण के सिद्धांत:
  रोग नियत्रंण से पूर्व उसकी प्रकृति, जीवन चक्र, संक्रमण की अवस्था तथा परपोषी पौधों की जानकारी आवश्यक है । इस ओर वैज्ञानिक लगातार प्रयत्नशील हैं, साथ ही सस्ते एवं प्रभावकारी रसायनों की खोज जारी है । आधुनिक विचार धारा के अनुसार फसल का पर्यावरण ऐसा हो जिसमें कवक, जीवाणु एवं वाइरस हानि न पहुंच सके । इसमें रोग रोधी किस्मों का विकास, परोक्ष में रोग विकास एवं वृद्धि के प्रतिकूल सस्यक्रियाएं अपनाना और सीधे रसायन (कवकनाशी) का रोग पर प्रहार सम्मलित हैं । सामान्यतः रोग ग्रसित फसल को बचाते-बचाते ही किसी कारण से देरी हो जाती है, जिससे फसल की उपज में काफी कमी आ जाती है । अतः रोग पैदा न होने देना ही नियंत्रण का सही उपाय है ।
रोग नियंत्रण विधियों को मुख्य रूप से ४ भागो में वर्गीकृत किया जा सकता है ।

  • अपवर्जन (Exclusion)
  • उन्मूलन (Eradication)
  • संरक्षण (Protection)
  • प्रतिरक्षीकरण (Immunization)

अपवर्जन:
  बिना रोक टोक के खाद्यान्नों एवं खाद्य पदार्थों का अंतर्राष्ट्रीय एवं अन्तर्राज्य स्तर पर आवागमन से काफी रोगों के प्रसारण में वृद्धि हुई है । इस प्रकार रोगग्रस्त क्षेत्रों से पौधे / वस्तुओं के आने को रोका जा सकता है, जिससे इनके विस्तार क्षेत्र में वृद्धि न हो । सभी देशों में संगरोध व्यवस्था (Quaantine Arrangements) की गई है, इसका पालन सबके हित में है । समय-समय पर इसके लिए विशेष कानून भी बनाए जाते रहें हैं । भारतवर्ष में १९१४ में संगरोध व्यवस्था लागू की गई तथा बाद में आवश्यकता अनुसार संशोधन होते रहे । विश्व में लगभग १५० देश इसका पालन करते हैं । रोग विस्तार के सभी माध्यमों जैसे भूमि, पानी एवं हवा के माध्यम से रोगकारी जीवाणु एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवेश न कर सकें, ऐसा प्रयास किया जाता है ।

उन्मूलन:
  कुछ परिस्थितियों में रोग ग्रसित पौधों का उन्मूलन ही आर्थिक दृष्टि से रोग नियंत्रण का लाभप्रद एवं आसान विधि होती है । इस विधि में ग्रसित क्षेत्र के पौधों या परपोषी फसल को ही नष्ट कर देना आर्थात काटकर जला देना अथवा मिट्टी में दबा देना होता है । फसल की अनुपस्थिति में ये रोगजनक अन्य खरपतवार इत्यादि के पौधे को अपना आश्रय बनाकर रहते है । अतः ऐसे पौधों (परपोषी) को काट कर नष्ट करने से भी इनका जीवन चक्र टूट जाएगा, जिससे नए संक्रमण को रोका जा सकता है । बदरा रोग सामान्यतः धान से पहले सावंक पर रहता है । अतः इन खरपतवारों को नष्ट करने से मूल निवेश द्रव्य की मात्रा में कमी होगी और धान की फसल में होने वाले बदरा रोग के प्रकोप की संभावनएं भी उसी अनुपात में कम होगी । इस प्रकार का प्रबंध भी उन्मूलन कहलाता है ।

फसल-चक्र अपनाने से भी इन रोगजनक जीवधारियों का जीवन चक्र टूटता है तथा रोग की सघनता में सार्थक कमी होती है, क्योंकि प्रत्येक रोग की अपनी विशेष परिस्थितिकी आवश्यकताएं होती है । इस प्रकार मृदा उत्पन्न रोग जीवधारियों पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है । खेत की सफाई एवं पहली फसल अवशेषों को नष्ट करना भी इसी ओर पहला कदम है । तनागलन ग्रसित फसल के अवशेषों को जलाना इसी विधि में आता है, इससे रोग संक्रमण घटेगा ।

बीजों को बिजाई से पूर्व पारायुक्त कवकनाशी (Organo Mercurial Fungicide) से उपचारित करने पर बीज जनित रोगों से फसल को मुक्त किया जा सकता है । एमीसान से बीजों का उपचार करने पर बकाने रोग के लक्षण प्रकट होने की संभावनाएं समाप्त हो जाती है अर्थात बीज द्वारा संक्रमण नहीं हो पाता तथा फसल रोग-मुक्त रहती है ।

संरक्षण:
  इस प्रकार के प्रबंध का उद्देश्य फसल को ऐसा वातावरण प्रदान करना है, जिससे रोगजनक पौधों पर संक्रमण न कर सकें । इसके लिए रसायनों का प्रयोग और पर्यावरणीय-चालक (Manipulation) जैसी व्यवस्था की जाती है जैसे हवा रोधकों आदि का उपयोग । कवकनाशी का प्रयोग भी दोनों के बीच ऐसा वातावरण पैदा करता है । अतः समय-समय पर विभिन्न कवकनाशियों के छिड़काव भुरकाव की आवश्यकता होती है, जिससे फसल को सुरक्षा प्राप्त होती रहती है । कवकनाशी वे रसायन है, जो कवक एवं जीवाणु द्वारा उत्पन्न रोगों के नियंत्रण हेतु प्रयोग किए जाते है । कुछ ही रसायन ऐसे हैं जो वाइरस संक्रमण से पौधों को संरक्षण देने में समर्थ हैं ।

रासायनिक पौध संरक्षक (कवकनाशी इत्यादि) भी सतह (Contact) एवं व्यवस्थित (Systematic) दोनों ही प्रकार से कार्य करते हैं । सतह संरक्षण में कवकनाशियों से बीज, पत्तियाँ एवं फल आदि को रोग से मुक्ति मिलती है, जबकि व्यवस्थित कवकनाशी परपोषी पौधे की शारीरिक क्रियाओं में प्रविष्ट होकर रोगजनकों (कवक एवं जीवाणु) के संक्रमण से पौधों की रक्षा करते है । इन कवकनाशियों को उनके रासायनिक गुणों के आधार पर भी जाना जाता है । मुख्यतः ये गंधक, तांबा, पारा, जैविक (Organic) तथा प्रति-जैविक (Antibiotic) आदि के ग्रुप में बाँटे जा सकता हैं ।

प्रतिरक्षीकरण (रोधन):

  पौधों में इस प्रकार की आंतरिक प्रतिरक्षा शक्ति उत्पन्न करना जिससे रोगजनक उन पर संक्रमण न कर सके, रोग नियंत्रण की प्रतिरक्षी विधि कहलाती है । वातावरण में रोग बीजाणु होने पर भी फसल के पौधों को प्रभावित न कर सके अर्थात पौधों में रोग-रोधिता की शक्ति उत्पन्न करना ही इस सिद्धांत का मूलमंत्र है । रोग रोधी किस्मों का विकास, ऐसा ही एक कदम है । जैसे एच.के.आर. १२० किस्म पर जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी का संक्रमण नहीं होता, जबकि पी.आर. १०६ इस रोग से ग्रसित हो जाती है । ऐसी ही किस्म विक्रमार्या, जो टुग्रों वाइरस से प्रभावित नही होती । कलिता आदि (१९९६) ने आई.आर.५०,पी.टी.बी. १८ एवं साकेत ४ किस्मों में एक अंक माप के साथ टुंग्रो वाइरस के प्रति -रोधिता पायी । इस प्रकार मुख्य बीमारियों के प्रति बहुत सी प्रतिरोधी किस्मों का विकास कर लिया गया है । इस प्रकार की रोग निरोधकता, रोग उत्पन्न होने से पूर्व कवकनाशियों के द्वारा बीजोपचार, पौद उपचार आदि से भी प्राप्त की जा सकती है ।रासायनिक उपचार संरक्षण विधि में भी कवकनाशियों का प्रयोग करते हैं, जिनका अनुभव के आधार पर रोग की संभावनाओं के समय पर कवकनाशी द्वारा पौधों का रोगों से बचाव करते हैं, परन्तु प्रतिरक्षक विधि में रोग आक्रमण से पूर्व किया गया उपचार ही आता है ।

   

            
 
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