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बबासमती एवं सुगंधित धान की किस्में तथा उनकी सस्य क्रियाऐं (प्रगतिषील किसानों के
अनुभवों पर आधारित) |
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भारतीय उपमहाद्धीप में उत्पादित बासमती धान अपनी गुणवत्ता के लिए विष्व बाज़ार में
एक अलग स्थान रखता है । महत्वपूर्ण गुण जैसे दानों की आकृति, सुगन्ध, लम्बाई और
चैड़ाई, अच्छा स्वाद, सुपाच्यता और अधिक समय तक इन गुणों का बने रहना, बासमती धान को
व्यावसायिक दृश्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण बनाते है । बासमती धान की परम्परागत
प्रजातियां लम्बी, गिरने के प्रति संवेदनषील प्रकाष-अवधि और तापमान से प्रभावित
होने के साथ ही कम उपज देती हैं । इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृशि
अनुसंधान संस्थान ने साठ के दषक में डा. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में अधिक उपज
देने वाली बासमती प्रजातियों के विकास के लिए एक प्रजनन कार्यक्रम षुरू किया ।
वर्तमान समय में बासमती की खेती लगभग 15 लाख हेक्टेयर भूमि में होती है तथा कुल
सालाना चावल उत्पादन 30 लाख टन है । इस प्रकार देखे तो बासमती की उन्नत प्रजातियों
की खेती ने बासमती धान का उत्पादन अविष्वसनीय ढ़ंग से बढ़ा दिया है तथा बासमती के
निर्यात में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है । वर्श 2003 में पूसा बासमती-1121 के विमोचन
के पष्चात् वर्श 2007-08 में बासमती चावल निर्यात ने नई ऊंचाइयों को छूते हुए 11.8
लाख टन का आँकड़ा पूरा किया, जिससे रू. 4344 करोड़ का विदेषी मुद्रा अर्जन हुआ ।
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